क्यूँ पूछते हो क्या तुमसे कहूं
मैं किस लिए जीता हूं
शायद की कभी मिल जाओ कही
मैं इसलिए जीता हूं....
जीने का मुझे कुछ शौक़ नहीं
बस वक़्त गुजारा करता हूं
कुछ देर उलझ के यादों में
दुनिया से किनारा करता हूं
मरता भी उसी के खातिर हुं
मैं किस लिए जीता हूं
शायद की कभी मिल जाओ कही
मैं इसलिए जीता हूं....
मैं हुं कि सुलगता रहता हूं
बुझता भी नहीं जलता भी नहीं
दिल हैं कि तड़पता रहता हैं
रुकता भी नहीं चलता भी नहीं
जीने की तमन्ना मिट भी चुकी
अब किस लिए जीता हूं
शायद की कभी मिल जाओ कही
मैं इसलिए जीता हूं....

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