जब ज़िद पे आ गई पार्वती, पार्वती, पार्वती
समझाने पहुँचे सप्तऋषि, सप्तऋषि, सप्तऋषि
काय ज़िद कर रई, काय ख़ुमर रई
ऐसे वर के लाने, जा के शीश पे गंगा
और गले में डारै फ़िर रये साँप
इतने सीधे साधे है.....
सब कहते भोलेनाथ भोलेनाथ..
ना खपरा ना छपरा, ना फूस की धरी मड़ैया
का खावे को धरो वहाँ, बस रोवत रहत लड़ईयाँ
भेष धरे अवधूत फिरे, अब तुमसे का कए बिन्नू
टोड़ा ड़ॅंगड ले घूमें, के बिनकैं कछुए नइयाॅं
के बिनकैं कछुए नइयाॅं
काय ज़िद कर रई, काय तप कर रई,
काय ख़ुमर रई, ऐसे वर के लाने
जा के शीश पे गंगा
और गले में डारै फ़िर रये साँप
इतने सीधे साधे है
सब कहते भोलेनाथ भोलेनाथ..
जटा लटा ना कबहु सँवारे
दिसत महाभयंकर, मुड़ पे आधाे और
बैला पे घूमे शंकर, राम नाम के रसिया हैं वे
और उन्हें क्या चाहने, काम देव के मर्दन हारी
घर गृहस्थी क्या जाने, वे घर गृहस्थी क्या जाने
काय ज़िद कर रई, काय तप कर रई,

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