चार दिन की फ़क़त चांदनी है
चांदनी का भरोसा नहीं है
इसलिए हूं अंधेरों का शैदा
रोशनी का भरोसा नहीं है...
कितने घरों के दियो को बुझाकर
क्यों मनाता है नादान दिवाली
जिंदगी पर अरे मरने वालों...2
जिंदगी का भरोसा नहीं है..
चार दिन की फ़क़त....
पहले ख़ुद्दारिया तो देखो
फिर मुझे शौक़ से गालियां दो
दुश्मनी इसलिए कर रहा हूं....2
दोस्ती का भरोसा नहीं है....
चार दिन की फ़क़त....
बिजली चमके तो जग सारा देखें
और गिरती है ये एक ही पर
जी कली से चमन में है रौनक...2
उस कली का भरोसा नहीं है....
चार दिन की फ़क़त.....

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